उस सभामें मय दानवने ऐसी माया फैला रखी थी कि दुर्योधनने उससे मोहित हो स्थलको जल समझकर अपने वस्त्र समेट लिये और जलको स्थल समझकर वह उसमें गिर पड़ा॥ ३७॥
स्थलेऽभ्यगृह्णाद् वस्त्रान्तं जलं मत्वा स्थलेऽपतत्।
जले च स्थलवद् भ्रान्त्या मयमायाविमोहितः॥ ३७
उस सभामें मय दानवने ऐसी माया फैला रखी थी कि दुर्योधनने उससे मोहित हो स्थलको जल समझकर अपने वस्त्र समेट लिये और जलको स्थल समझकर वह उसमें गिर पड़ा॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.75.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 601) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/75/37/