श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

स्थलेऽभ्यगृह्णाद् वस्त्रान्तं जलं मत्वा स्थलेऽपतत्।

जले च स्थलवद् भ्रान्त्या मयमायाविमोहितः॥ ३७

sthale'bhyagṛhṇād vastrāntaṃ jalaṃ matvā sthale'patat|

jale ca sthalavad bhrāntyā mayamāyāvimohitaḥ|| 37

अर्थ

उस सभामें मय दानवने ऐसी माया फैला रखी थी कि दुर्योधनने उससे मोहित हो स्थलको जल समझकर अपने वस्त्र समेट लिये और जलको स्थल समझकर वह उसमें गिर पड़ा॥ ३७॥

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