श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

सभायां मयक्लृप्तायां क्वापि धर्मसुतोऽधिराट्।

वृतोऽनुजैर्बन्धुभिश्‍च कृष्णेनापि स्वचक्षुषा॥ ३४

sabhāyāṃ mayaklṛptāyāṃ kvāpi dharmasuto'dhirāṭ|

vṛto'nujairbandhubhiśca kṛṣṇenāpi svacakṣuṣā|| 34

अर्थ

एक दिन राजाधिराज महाराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, सम्बन्धियों एवं अपने नयनोंके तारे परम हितैषी भगवान् श्रीकृष्णके साथ मयदानवकी बनायी सभामें स्वर्णसिंहासनपर देवराज इन्द्रके समान विराजमान थे। उनकी भोग-सामग्री, उनकी राज्यलक्ष्मी ब्रह्माजीके ऐश्‍वर्यके समान थी। वंदीजन उनकी स्तुति कर रहे थे॥ ३४-३५॥

यह अर्थ श्लोक 34–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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