॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.75.13
सदस्यर्त्विग्द्विजश्रेष्ठा ब्रह्मघोषेण भूयसा।
देवर्षिपितृगन्धर्वास्तुष्टुवुः पुष्पवर्षिणः॥ १३
sadasyartvigdvijaśreṣṭhā brahmaghoṣeṇa bhūyasā|
devarṣipitṛgandharvāstuṣṭuvuḥ puṣpavarṣiṇaḥ|| 13
अर्थ
यज्ञके सदस्य ऋत्विज् और बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदमन्त्रोंका ऊँचे स्वरसे उच्चारण करते हुए चले। देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥ १३॥