॥ श्रीहरिः ॥
चैद्यदेहोत्थितं ज्योतिर्वासुदेवमुपाविशत्।
पश्यतां सर्वभूतानामुल्केव भुवि खाच्च्युता॥ ४५
caidyadehotthitaṃ jyotirvāsudevamupāviśat|
paśyatāṃ sarvabhūtānāmulkeva bhuvi khāccyutā|| 45
अर्थ
जैसे आकाशसे गिरा हुआ लूक धरतीमें समा जाता है, वैसे ही सब प्राणियोंके देखते-देखते शिशुपालके शरीरसे एक ज्योति निकलकर भगवान् श्रीकृष्णमें समा गयी॥ ४५॥
चैद्यदेहोत्थितं ज्योतिर्वासुदेवमुपाविशत्।
पश्यतां सर्वभूतानामुल्केव भुवि खाच्च्युता॥ ४५
जैसे आकाशसे गिरा हुआ लूक धरतीमें समा जाता है, वैसे ही सब प्राणियोंके देखते-देखते शिशुपालके शरीरसे एक ज्योति निकलकर भगवान् श्रीकृष्णमें समा गयी॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 596) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/45/