॥ श्रीहरिः ॥
ततः पाण्डुसुताः क्रुद्धा मत्स्यकैकयसृंजयाः।
उदायुधाः समुत्तस्थुः शिशुपालजिघांसवः॥ ४१
tataḥ pāṇḍusutāḥ kruddhā matsyakaikayasṛṃjayāḥ|
udāyudhāḥ samuttasthuḥ śiśupālajighāṃsavaḥ|| 41
अर्थ
परीक्षित्! अब शिशुपालको मार डालनेके लिये पाण्डव, मत्स्य, केकय और सृंजयवंशी नरपति क्रोधित होकर हाथोंमें हथियार ले उठ खड़े हुए॥ ४१॥
ततः पाण्डुसुताः क्रुद्धा मत्स्यकैकयसृंजयाः।
उदायुधाः समुत्तस्थुः शिशुपालजिघांसवः॥ ४१
परीक्षित्! अब शिशुपालको मार डालनेके लिये पाण्डव, मत्स्य, केकय और सृंजयवंशी नरपति क्रोधित होकर हाथोंमें हथियार ले उठ खड़े हुए॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 595) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/41/