॥ श्रीहरिः ॥
भगवन्निन्दनं श्रुत्वा दुःसहं तत् सभासदः।
कर्णौ पिधाय निर्जग्मुः शपन्तश्चेदिपं रुषा॥ ३९
bhagavannindanaṃ śrutvā duḥsahaṃ tat sabhāsadaḥ|
karṇau pidhāya nirjagmuḥ śapantaścedipaṃ ruṣā|| 39
अर्थ
परन्तु सभासदोंके लिये भगवान्की निन्दा सुनना असह्य था। उनमेंसे कई अपने-अपने कान बंद करके क्रोधसे शिशुपालको गाली देते हुए बाहर चले गये॥ ३९॥
भगवन्निन्दनं श्रुत्वा दुःसहं तत् सभासदः।
कर्णौ पिधाय निर्जग्मुः शपन्तश्चेदिपं रुषा॥ ३९
परन्तु सभासदोंके लिये भगवान्की निन्दा सुनना असह्य था। उनमेंसे कई अपने-अपने कान बंद करके क्रोधसे शिशुपालको गाली देते हुए बाहर चले गये॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 595) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/39/