पर मैं मानता हूँ कि आपलोग अग्रपूजाके योग्य पात्रका निर्णय करनेमें सर्वथा समर्थ हैं। इसलिये सदसस्पतियो! आपलोग बालक सहदेवकी यह बात ठीक न मानें कि ‘कृष्ण ही अग्रपूजाके योग्य हैं॥ ३२॥
यूयं पात्रविदां श्रेष्ठा मा मन्ध्वं बालभाषितम्।
सदसस्पतयः सर्वे कृष्णो यत् सम्मतोऽर्हणे॥ ३२
पर मैं मानता हूँ कि आपलोग अग्रपूजाके योग्य पात्रका निर्णय करनेमें सर्वथा समर्थ हैं। इसलिये सदसस्पतियो! आपलोग बालक सहदेवकी यह बात ठीक न मानें कि ‘कृष्ण ही अग्रपूजाके योग्य हैं॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 594) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/32/