॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.74.27
तत्पादाववनिज्यापः शिरसा लोकपावनीः।
सभार्यः सानुजामात्यः१ सकुटुम्बोऽवहन्मुदा॥ २७
tatpādāvavanijyāpaḥ śirasā lokapāvanīḥ|
sabhāryaḥ sānujāmātyaḥ sakuṭumbo'vahanmudā|| 27
अर्थ
अपनी पत्नी, भाई, मन्त्री और कुटुम्बियोंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरने बड़े प्रेम और आनन्दसे भगवान्के पाँव पखारे तथा उनके चरणकमलोंका लोकपावन जल अपने सिरपर धारण किया॥ २७॥
टिप्पणियाँ
- १
जोऽव्यग्रः।