॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.72.1
अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः
पाण्डवोंके राजसूययज्ञका आयोजन और जरासन्धका उद्धार
श्रीशुक उवाच
एकदा तु सभामध्ये आस्थितो मुनिभिर्वृतः।
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैर्भ्रातृभिश्च युधिष्ठिरः॥ १
ekadā tu sabhāmadhye āsthito munibhirvṛtaḥ|
brāhmaṇaiḥ kṣatriyairvaiśyairbhrātṛbhiśca yudhiṣṭhiraḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक दिन महाराज युधिष्ठिर बहुत-से मुनियों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, भीमसेन आदि भाइयों, आचार्यों, कुलके बड़े-बूढ़ों, जाति-बन्धुओं, सम्बन्धियों एवं कुटुम्बियोंके साथ राजसभामें बैठे हुए थे। उन्होंने सबके सामने ही भगवान् श्रीकृष्णको सम्बोधित करके यह बात कही॥ १-२॥