श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

कालिन्दीं मित्रविन्दां च शैब्यां ना‌ग्‍नजितीं सतीम्।

अन्याश्‍चाभ्यागता यास्तु वासःस्रङ्मण्डनादिभिः॥ ४३

kālindīṃ mitravindāṃ ca śaibyāṃ nāgnajitīṃ satīm|

anyāścābhyāgatā yāstu vāsaḥsraṅmaṇḍanādibhiḥ|| 43

अर्थ

अपनी सास कुन्तीकी प्रेरणासे द्रौपदीने वस्त्र, आभूषण, माला आदिके द्वारा रुक्मिणी, सत्यभामा, भद्रा, जाम्बवती, कालिन्दी, मित्रविन्दा, लक्ष्मणा और परम साध्वी सत्या—भगवान् श्रीकृष्णकी इन पटरानियोंका तथा वहाँ आयी हुई श्रीकृष्णकी अन्यान्य रानियोंका भी यथायोग्य सत्कार किया॥ ४२-४३॥

यह अर्थ श्लोक 42–43 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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