श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

तत्र तत्रोपसंगम्य पौरा मंगलपाणयः।

चक्रुः सपर्यां कृष्णाय श्रेणीमुख्या हतैनसः॥ ३७

tatra tatropasaṃgamya paurā maṃgalapāṇayaḥ|

cakruḥ saparyāṃ kṛṣṇāya śreṇīmukhyā hatainasaḥ|| 37

अर्थ

इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण राजपथसे चल रहे थे। स्थान-स्थानपर बहुत-से निष्पाप धनी-मानी और शिल्पजीवी नागरिकोंने अनेकों मांगलिक वस्तुएँ ला-लाकर उनकी पूजा-अर्चा और स्वागत-सत्कार किया॥ ३७॥✎ 2130

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2130 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें