prapannāḥ pādamūlaṃ te dīnānāṃ śaṃ vidhīyatām|| 31
अर्थ
दूतने कहा—भगवन्! जरासन्धके बंदी नरपतियोंने इस प्रकार आपसे प्रार्थना की है। वे आपके चरणकमलोंकी शरणमें हैं और आपका दर्शन चाहते हैं। आप कृपा करके उन दीनोंका कल्याण कीजिये॥ ३१॥
इति मागधसंरुद्धा भवद्दर्शनकांक्षिणः।
प्रपन्नाः पादमूलं ते दीनानां शं विधीयताम्॥ ३१
दूतने कहा—भगवन्! जरासन्धके बंदी नरपतियोंने इस प्रकार आपसे प्रार्थना की है। वे आपके चरणकमलोंकी शरणमें हैं और आपका दर्शन चाहते हैं। आप कृपा करके उन दीनोंका कल्याण कीजिये॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 571) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/70/31/