श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

तत्रोपविष्टः परमासने विभु-

र्बभौ स्वभासा ककुभोऽवभासयन्।

वृतो नृसिंहैर्यदुभिर्यदूत्तमो

यथोडुराजो दिवि तारकागणैः॥ १८

tatropaviṣṭaḥ paramāsane vibhu-

rbabhau svabhāsā kakubho'vabhāsayan|

vṛto nṛsiṃhairyadubhiryadūttamo

yathoḍurājo divi tārakāgaṇaiḥ|| 18

अर्थ

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण सब रानियोंसे अलग-अलग विदा होकर एक ही रूपमें सुधर्मा-सभामें प्रवेश करते और वहाँ जाकर श्रेष्ठ सिंहासनपर विराज जाते। उनकी अंगकान्तिसे दिशाएँ प्रकाशित होती रहतीं। उस समय यदुवंशी वीरोंके बीचमें यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णकी ऐसी शोभा होती, जैसे आकाशमें तारोंसे घिरे हुए चन्द्रदेव शोभायमान होते हैं॥ १८॥

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