उस समय रनिवासकी स्त्रियाँ लज्जा एवं प्रेमसे भरी चितवनसे उन्हें निहारने लगतीं और बड़े कष्टसे उन्हें विदा करतीं। भगवान् मुसकराकर उनके चित्तको चुराते हुए महलसे निकलते॥ १६॥
ईक्षितोऽन्तःपुरस्त्रीणां सव्रीडप्रेमवीक्षितैः।
कृच्छ्राद् विसृष्टो निरगाज्जातहासो हरन् मनः॥ १६
उस समय रनिवासकी स्त्रियाँ लज्जा एवं प्रेमसे भरी चितवनसे उन्हें निहारने लगतीं और बड़े कष्टसे उन्हें विदा करतीं। भगवान् मुसकराकर उनके चित्तको चुराते हुए महलसे निकलते॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 568) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/70/16/