श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

विष्टब्धं विद्रुमस्तम्भैर्वैदूर्यफलकोत्तमैः।

इन्द्रनीलमयैः कुड्यैर्जगत्या४ चाहतत्विषा॥ ९

viṣṭabdhaṃ vidrumastambhairvaidūryaphalakottamaiḥ|

indranīlamayaiḥ kuḍyairjagatyā cāhatatviṣā|| 9

अर्थ

उस महलमें मूँगोंके खम्भे, वैदूर्यके उत्तम-उत्तम छज्जे तथा इन्द्रनीलमणिकी दीवारें जगमगा रही थीं और वहाँकी गचें भी ऐसी इन्द्र-नीलमणियोंसे बनी हुई थीं, जिनकी चमक किसी प्रकार कम नहीं होती॥ ९॥✎ 2127

टिप्पणियाँ

  1. ४

    र्जालैर्मरकतोत्तमैः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 561)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2127 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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