उस महलमें मूँगोंके खम्भे, वैदूर्यके उत्तम-उत्तम छज्जे तथा इन्द्रनीलमणिकी दीवारें जगमगा रही थीं और वहाँकी गचें भी ऐसी इन्द्र-नीलमणियोंसे बनी हुई थीं, जिनकी चमक किसी प्रकार कम नहीं होती॥ ९॥✎ 2127
विष्टब्धं विद्रुमस्तम्भैर्वैदूर्यफलकोत्तमैः।
इन्द्रनीलमयैः कुड्यैर्जगत्या चाहतत्विषा॥ ९
उस महलमें मूँगोंके खम्भे, वैदूर्यके उत्तम-उत्तम छज्जे तथा इन्द्रनीलमणिकी दीवारें जगमगा रही थीं और वहाँकी गचें भी ऐसी इन्द्र-नीलमणियोंसे बनी हुई थीं, जिनकी चमक किसी प्रकार कम नहीं होती॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 561) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/9/