श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

तस्यामन्तःपुरं श्रीमदर्चितं सर्वधिष्ण्यपैः।

हरेः३ स्वकौशलं यत्र त्वष्ट्रा कार्त्स्न्येन दर्शितम्॥ ७

tasyāmantaḥpuraṃ śrīmadarcitaṃ sarvadhiṣṇyapaiḥ|

hareḥ svakauśalaṃ yatra tvaṣṭrā kārtsnyena darśitam|| 7

अर्थ

उसी द्वारकानगरीमें भगवान् श्रीकृष्णका बहुत ही सुन्दर अन्तःपुर था। बड़े-बड़े लोकपाल उसकी पूजा-प्रशंसा किया करते थे। उसका निर्माण करनेमें विश्‍वकर्माने अपना सारा कला-कौशल, सारी कारीगरी लगा दी थी॥ ७॥✎ 2127

टिप्पणियाँ

  1. ३

    सर्वविस्मापकं यत्‍नात्त्वष्ट्रा कार्त्स्न्येन निर्मितम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 561)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2127 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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