उसी द्वारकानगरीमें भगवान् श्रीकृष्णका बहुत ही सुन्दर अन्तःपुर था। बड़े-बड़े लोकपाल उसकी पूजा-प्रशंसा किया करते थे। उसका निर्माण करनेमें विश्वकर्माने अपना सारा कला-कौशल, सारी कारीगरी लगा दी थी॥ ७॥✎ 2127
तस्यामन्तःपुरं श्रीमदर्चितं सर्वधिष्ण्यपैः।
हरेः स्वकौशलं यत्र त्वष्ट्रा कार्त्स्न्येन दर्शितम्॥ ७
उसी द्वारकानगरीमें भगवान् श्रीकृष्णका बहुत ही सुन्दर अन्तःपुर था। बड़े-बड़े लोकपाल उसकी पूजा-प्रशंसा किया करते थे। उसका निर्माण करनेमें विश्वकर्माने अपना सारा कला-कौशल, सारी कारीगरी लगा दी थी॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 561) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/7/