श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

ध्यायन्तमेकमासीनं पुरुषं प्रकृतेः परम्।

शुश्रूषन्तं गुरून् क्वापि कामैर्भोगैः सपर्यया॥ ३०

dhyāyantamekamāsīnaṃ puruṣaṃ prakṛteḥ param|

śuśrūṣantaṃ gurūn kvāpi kāmairbhogaiḥ saparyayā|| 30

अर्थ

कहीं एकान्तमें बैठकर प्रकृतिसे अतीत पुराण-पुरुषका ध्यान कर रहे हैं, तो कहीं गुरुजनोंको इच्छित भोग-सामग्री समर्पित करके उनकी सेवा-शुश्रूषा कर रहे हैं॥ ३०॥✎ 1705

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1705 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-कुण्डोंमें → यज्ञकुण्डोंमें

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