नारदजीको देखते ही समस्त धार्मिकोंके मुकुटमणि भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके पलँगसे सहसा उठ खड़े हुए। उन्होंने देवर्षि नारदके युगलचरणोंमें मुकुटयुक्त सिरसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उन्हें अपने आसनपर बैठाया॥ १४॥✎ 1704
तं सन्निरीक्ष्य भगवान् सहसोत्थितः श्री-
पर्यङ्कतः सकलधर्मभृतां वरिष्ठः।
आनम्य पादयुगलं शिरसा किरीट-
जुष्टेन साञ्जलिरवीविशदासने स्वे॥ १४
नारदजीको देखते ही समस्त धार्मिकोंके मुकुटमणि भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके पलँगसे सहसा उठ खड़े हुए। उन्होंने देवर्षि नारदके युगलचरणोंमें मुकुटयुक्त सिरसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उन्हें अपने आसनपर बैठाया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 562) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)