श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

रत्‍नप्रदीपनिकरद्युतिभिर्निरस्त-

ध्वान्तं विचित्रवलभीषु शिखण्डिनोऽङ्ग।

नृत्यन्ति यत्र विहितागुरुधूपमक्षै-

र्निर्यान्तमीक्ष्य घनबुद्धय उन्‍नदन्तः॥ १२

ratnapradīpanikaradyutibhirnirasta-

dhvāntaṃ vicitravalabhīṣu śikhaṇḍino'ṅga|

nṛtyanti yatra vihitāgurudhūpamakṣai-

rniryāntamīkṣya ghanabuddhaya unnadantaḥ|| 12

अर्थ

अनेकों रत्‍न-प्रदीप अपनी जगमगाहटसे उसका अन्धकार दूर कर रहे थे। अगरकी धूप देनेके कारण झरोखोंसे धूआँ निकल रहा था। उसे देखकर रंग-बिरंगे मणिमय छज्जोंपर बैठे हुए मोर बादलोंके भ्रमसे कूक-कूककर नाचने लगते॥ १२॥✎ 2127

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2127 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें