श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

ततः प्रविष्टः स्वपुरं हलायुधः

समेत्य बन्धूननुरक्तचेतसः।

शशंस सर्वं यदुपुंगवानां

मध्ये सभायां कुरुषु स्वचेष्टितम्॥ ५३

tataḥ praviṣṭaḥ svapuraṃ halāyudhaḥ

sametya bandhūnanuraktacetasaḥ|

śaśaṃsa sarvaṃ yadupuṃgavānāṃ

madhye sabhāyāṃ kuruṣu svaceṣṭitam|| 53

अर्थ

अब बलरामजी द्वारकापुरीमें पहुँचे और अपने प्रेमी तथा समाचार जाननेके लिये उत्सुक बन्धु-बान्धवोंसे मिले। उन्होंने यदुवंशियोंकी भरी सभामें अपना वह सारा चरित्र कह सुनाया, जो हस्तिनापुरमें उन्होंने कौरवोंके साथ किया था॥ ५३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें