॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.68.4
निगृहीतं सुतं श्रुत्वा यद्येष्यन्तीह वृष्णयः।
भग्नदर्पाः शमं यान्ति प्राणा इव सुसंयताः॥ ४
nigṛhītaṃ sutaṃ śrutvā yadyeṣyantīha vṛṣṇayaḥ|
bhagnadarpāḥ śamaṃ yānti prāṇā iva susaṃyatāḥ|| 4
अर्थ
यदि वे लोग अपने इस लड़केके बंदी होनेका समाचार सुनकर यहाँ आयेंगे, तो हमलोग उनका सारा घमंड चूर-चूर कर देंगे और उन लोगोंके मिजाज वैसे ही ठंडे हो जायँगे, जैसे संयमी पुरुषके द्वारा प्राणायाम आदि उपायोंसे वशमें की हुई इन्द्रियाँ ’॥ ४॥✎ 1701