॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.68.28
कथमिन्द्रोऽपि कुरुभिर्भीष्मद्रोणार्जुनादिभिः।
अदत्तमवरुन्धीत सिंहग्रस्तमिवोरणः॥ २८
kathamindro'pi kurubhirbhīṣmadroṇārjunādibhiḥ|
adattamavarundhīta siṃhagrastamivoraṇaḥ|| 28
अर्थ
जैसे सिंहका ग्रास कभी भेड़ा नहीं छीन सकता, वैसे ही यदि भीष्म, द्रोण, अर्जुन आदि कौरववीर जान-बूझकर न छोड़ दें, न दे दें तो स्वयं देवराज इन्द्र भी किसी वस्तुका उपभोग कैसे कर सकते हैं?॥ २८॥✎ 1703