श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

ततोऽग्‍निरुत्थितः कुण्डान्मूर्तिमानतिभीषणः।

तप्तताम्रशिखाश्मश्रुरंगारोद्गारिलोचनः॥ ३२

tato'gnirutthitaḥ kuṇḍānmūrtimānatibhīṣaṇaḥ|

taptatāmraśikhāśmaśruraṃgārodgārilocanaḥ|| 32

अर्थ

अभिचार पूर्ण होते ही यज्ञकुण्डसे अति भीषण अग्‍नि मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसके केश और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल-लाल थे। आँखोंसे अंगारे बरस रहे थे॥ ३२॥✎ 893 1953

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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