श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

शिरः पतितमालोक्य राजद्वारे सकुण्डलम्।

किमिदं कस्य वा वक्त्रमिति संशिश्यिरे जनाः॥ २५

śiraḥ patitamālokya rājadvāre sakuṇḍalam|

kimidaṃ kasya vā vaktramiti saṃśiśyire janāḥ|| 25

अर्थ

इधर काशीमें राजमहलके दरवाजेपर एक कुण्डल-मण्डित मुण्ड गिरा देखकर लोग तरह-तरहका सन्देह करने लगे और सोचने लगे कि ‘यह क्या है, यह किसका सिर है?’॥ २५॥

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