श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

दिष्ट्या कंसो हतः पापो दिष्ट्या मुक्ताः सुहृज्जनाः।

निहत्य निर्जित्य रिपून् दिष्ट्या दुर्गं समाश्रिताः॥ ८

diṣṭyā kaṃso hataḥ pāpo diṣṭyā muktāḥ suhṛjjanāḥ|

nihatya nirjitya ripūn diṣṭyā durgaṃ samāśritāḥ|| 8

अर्थ

यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि पापी कंसको आपलोगोंने मार डाला और अपने सुहृद्-सम्बन्धियोंको बड़े कष्टसे बचा लिया। यह भी कम आनन्दकी बात नहीं है कि आपलोगोंने और भी बहुत-से शत्रुओंको मार डाला या जीत लिया और अब अत्यन्त सुरक्षित दुर्ग (किले) में आपलोग निवास करते हैं’॥ ८॥✎ 1699

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1699 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आप-लोगोंको → आपलोगोंको

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें