श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

गोपवृद्धांश्‍च विधिवद् यविष्ठैरभिवन्दितः।

यथावयो यथासख्यं यथासम्बन्धमात्मनः॥ ४

gopavṛddhāṃśca vidhivad yaviṣṭhairabhivanditaḥ|

yathāvayo yathāsakhyaṃ yathāsambandhamātmanaḥ|| 4

अर्थ

इसके बाद बड़े-बड़े गोपोंको बलरामजीने और छोटे-छोटे गोपोंने बलरामजीको नमस्कार किया। वे अपनी आयु, मेल-जोल और सम्बन्धके अनुसार सबसे मिले-जुले॥ ४॥✎ 1699

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1699 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आप-लोगोंको → आपलोगोंको

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