श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

अद्यापि दृश्यते राजन् यमुनाऽऽकृष्टवर्त्मना।

बलस्यानन्तवीर्यस्य वीर्यं सूचयतीव हि॥ ३१

adyāpi dṛśyate rājan yamunā''kṛṣṭavartmanā|

balasyānantavīryasya vīryaṃ sūcayatīva hi|| 31

अर्थ

परीक्षित्! यमुनाजी अब भी बलरामजीके खींचे हुए मार्गसे बहती हैं और वे ऐसी जान पड़ती हैं, मानो अनन्तशक्ति भगवान् बलरामजीका यश-गान कर रही हों॥ ३१॥

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