उस समय गोपियाँ बलरामजीके चारों ओर उनके चरित्रका गान कर रही थीं, और वे मतवाले-से होकर वनमें विचर रहे थे। उनके नेत्र आनन्दमदसे विह्वल हो रहे थे॥ २१॥
उपगीयमानचरितो वनिताभिर्हलायुधः।
वनेषु व्यचरत् क्षीबो मदविह्वललोचनः॥ २१
उस समय गोपियाँ बलरामजीके चारों ओर उनके चरित्रका गान कर रही थीं, और वे मतवाले-से होकर वनमें विचर रहे थे। उनके नेत्र आनन्दमदसे विह्वल हो रहे थे॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.65.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 544) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/65/21/