परीक्षित्! भगवान् बलरामजी नाना प्रकारसे अनुनयविनय करनेमें बड़े निपुण थे। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके हृदयस्पर्शी और लुभावने सन्देश सुना-सुनाकर गोपियोंको सान्त्वना दी॥ १६॥
संकर्षणस्ताः कृष्णस्य सन्देशैर्हृदयंगमैः।
सान्त्वयामास भगवान् नानानुनयकोविदः॥ १६
परीक्षित्! भगवान् बलरामजी नाना प्रकारसे अनुनयविनय करनेमें बड़े निपुण थे। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके हृदयस्पर्शी और लुभावने सन्देश सुना-सुनाकर गोपियोंको सान्त्वना दी॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.65.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 544) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/65/16/