श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

दशामिमां वा कतमेन कर्मणा

सम्प्रापितोऽस्यतदर्हः सुभद्र।

आत्मानमाख्याहि विवित्सतां नो

यन्मन्यसे नः क्षममत्र वक्तुम्॥ ८

daśāmimāṃ vā katamena karmaṇā

samprāpito'syatadarhaḥ subhadra|

ātmānamākhyāhi vivitsatāṃ no

yanmanyase naḥ kṣamamatra vaktum|| 8

अर्थ

कल्याणमूर्ते! किस कर्मके फलसे तुम्हें इस योनिमें आना पड़ा था? वास्तवमें तुम इसके योग्य नहीं हो। हमलोग तुम्हारा वृत्तान्त जानना चाहते हैं। यदि तुम हमलोगोंको वह बतलाना उचित समझो तो अपना परिचय अवश्य दो’॥ ८॥

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