श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

एवं विश्राव्य भगवान् मुकुन्दो द्वारकौकसः३।

पावनः सर्वलोकानां विवेश निजमन्दिरम्॥ ४४

evaṃ viśrāvya bhagavān mukundo dvārakaukasaḥ|

pāvanaḥ sarvalokānāṃ viveśa nijamandiram|| 44

अर्थ

परीक्षित्! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकावासियोंको इस प्रकार उपदेश देकर अपने महलमें चले गये॥ ४४॥✎ 1698 2124 2125 2126

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
नृगोपाख्यानं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    द्वारकाप्रजाः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 541)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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