श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

देवदेव जगन्‍नाथ गोविन्द पुरुषोत्तम।

नारायण हृषीकेश पुण्यश्‍लोकाच्युताव्यय॥ २७

devadeva jagannātha govinda puruṣottama|

nārāyaṇa hṛṣīkeśa puṇyaślokācyutāvyaya|| 27

अर्थ

देवताओंके भी आराध्यदेव! पुरुषोत्तम गोविन्द! आप ही व्यक्त और अव्यक्त जगत् तथा जीवोंके स्वामी हैं। अविनाशी अच्युत! आपकी कीर्ति पवित्र है। अन्तर्यामी नारायण! आप ही समस्त वृत्तियों और इन्द्रियोंके स्वामी हैं॥ २७॥

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