श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

स्वलंकृतेभ्यो गुणशीलवद‍्भ्यः

सीदत्कुटुम्बेभ्य ऋतव्रतेभ्यः।

तपःश्रुतब्रह्मवदान्यसद‍्भ्यः

प्रादां युवभ्यो द्विजपुंगवेभ्यः॥ १४

svalaṃkṛtebhyo guṇaśīlavadbhyaḥ

sīdatkuṭumbebhya ṛtavratebhyaḥ|

tapaḥśrutabrahmavadānyasadbhyaḥ

prādāṃ yuvabhyo dvijapuṃgavebhyaḥ|| 14

अर्थ

भगवन्! मैं युवावस्थासे सम्पन्‍न श्रेष्ठ ब्राह्मणकुमारोंको—जो सद्गुणी, शीलसम्पन्‍न, कष्टमें पड़े हुए कुटुम्बवाले, दम्भरहित तपस्वी, वेदपाठी, शिष्योंको विद्यादान करनेवाले तथा सच्चरित्र होते—वस्त्राभूषणसे अलंकृत करता और उन गौओंका दान करता॥ १४॥

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