॥ श्रीहरिः ॥
यावत्यः सिकता भूमेर्यावत्यो दिवि तारकाः।
यावत्यो वर्षधाराश्च तावतीरददां स्म गाः॥ १२
yāvatyaḥ sikatā bhūmeryāvatyo divi tārakāḥ|
yāvatyo varṣadhārāśca tāvatīradadāṃ sma gāḥ|| 12
अर्थ
भगवन्! पृथ्वीमें जितने धूलिकण हैं, आकाशमें जितने तारे हैं और वर्षामें जितनी जलकी धाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थीं॥ १२॥
यावत्यः सिकता भूमेर्यावत्यो दिवि तारकाः।
यावत्यो वर्षधाराश्च तावतीरददां स्म गाः॥ १२
भगवन्! पृथ्वीमें जितने धूलिकण हैं, आकाशमें जितने तारे हैं और वर्षामें जितनी जलकी धाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थीं॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/12/