॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.63.42
यस्त्वां विसृजते मर्त्य आत्मानं प्रियमीश्वरम्।
विपर्ययेन्द्रियार्थार्थं विषमत्त्यमृतं त्यजन्॥ ४२
yastvāṃ visṛjate martya ātmānaṃ priyamīśvaram|
viparyayendriyārthārthaṃ viṣamattyamṛtaṃ tyajan|| 42
अर्थ
प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके आत्मा, प्रियतम और ईश्वर हैं। जो मृत्युका ग्रास मनुष्य आपको छोड़ देता है और अनात्म, दुःखरूप एवं तुच्छ विषयोंमें सुखबुद्धि करके उनके पीछे भटकता है, वह इतना मूर्ख है कि अमृतको छोड़कर विष पी रहा है॥ ४२॥