श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.63.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 63 · अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः

यन्मायामोहितधियः पुत्रदारगृहादिषु।

उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति प्रसक्ता वृजिनार्णवे॥ ४०

yanmāyāmohitadhiyaḥ putradāragṛhādiṣu|

unmajjanti nimajjanti prasaktā vṛjinārṇave|| 40

अर्थ

भगवन्! आपकी मायासे मोहित होकर लोग स्त्री-पुत्र, देह-गेह आदिमें आसक्त हो जाते हैं और फिर दुःखके अपार सागरमें डूबने-उतराने लगते हैं॥ ४०॥

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