॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.63.36
रोमाणि यस्यौषधयोऽम्बुवाहाः
केशा विरिञ्चो धिषणा विसर्गः।
प्रजापतिर्हृदयं यस्य धर्मः
स वै भवान् पुरुषो लोककल्पः॥ ३६
romāṇi yasyauṣadhayo'mbuvāhāḥ
keśā viriñco dhiṣaṇā visargaḥ|
prajāpatirhṛdayaṃ yasya dharmaḥ
sa vai bhavān puruṣo lokakalpaḥ|| 36
अर्थ
धान्यादि ओषधियाँ रोम हैं, मेघ केश हैं और ब्रह्मा बुद्धि। प्रजापति लिंग हैं और धर्म हृदय। इस प्रकार समस्त लोक और लोकान्तरोंके साथ जिसके शरीरकी तुलना की जाती है, वे परमपुरुष आप ही हैं॥ ३६॥