श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.63.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 63 · अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः

रोमाणि यस्यौषधयोऽम्बुवाहाः

केशा विरिञ्चो धिषणा विसर्गः।

प्रजापतिर्हृदयं यस्य धर्मः

स वै भवान् पुरुषो लोककल्पः॥ ३६

romāṇi yasyauṣadhayo'mbuvāhāḥ

keśā viriñco dhiṣaṇā visargaḥ|

prajāpatirhṛdayaṃ yasya dharmaḥ

sa vai bhavān puruṣo lokakalpaḥ|| 36

अर्थ

धान्यादि ओषधियाँ रोम हैं, मेघ केश हैं और ब्रह्मा बुद्धि। प्रजापति लिंग हैं और धर्म हृदय। इस प्रकार समस्त लोक और लोकान्तरोंके साथ जिसके शरीरकी तुलना की जाती है, वे परमपुरुष आप ही हैं॥ ३६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें