श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.63.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 63 · अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः

प्रेतमातृपिशाचांश्‍च कूष्माण्डान् ब्रह्मराक्षसान्।

द्रावयामास तीक्ष्णाग्रैः शरैः शार्ङ्गधनुश्‍च्युतैः॥ ११

pretamātṛpiśācāṃśca kūṣmāṇḍān brahmarākṣasān|

drāvayāmāsa tīkṣṇāgraiḥ śaraiḥ śārṅgadhanuścyutaiḥ|| 11

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने अपने शार्ङ्गधनुषके तीखी नोकवाले बाणोंसे शंकरजीके अनुचरों—भूत, प्रेत, प्रमथ, गुह्यक, डाकिनी, यातुधान, वेताल, विनायक, प्रेतगण, मातृगण, पिशाच, कूष्माण्ड और ब्रह्म-राक्षसोंको मार-मारकर खदेड़ दिया॥ १०-११॥

यह अर्थ श्लोक 10–11 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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