श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

स एकदाऽऽह गिरिशं पार्श्‍वस्थं वीर्यदुर्मदः।

किरीटेनार्कवर्णेन संस्पृशंस्तत्पदाम्बुजम्॥ ६

sa ekadā''ha giriśaṃ pārśvasthaṃ vīryadurmadaḥ|

kirīṭenārkavarṇena saṃspṛśaṃstatpadāmbujam|| 6

अर्थ

एक दिन बल-पौरुषके घमंडमें चूर बाणासुरने अपने समीप ही स्थित भगवान् शंकरके चरणकमलोंको सूर्यके समान चमकीले मुकुटसे छूकर प्रणाम किया और कहा—॥ ६॥

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