॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.62.27
तां तथा यदुवीरेण भुज्यमानां हतव्रताम्।
हेतुभिर्लक्षयांचक्रुराप्रीतां दुरवच्छदैः॥ २७
tāṃ tathā yaduvīreṇa bhujyamānāṃ hatavratām|
hetubhirlakṣayāṃcakrurāprītāṃ duravacchadaiḥ|| 27
अर्थ
परीक्षित्! यदुकुमार अनिरुद्धजीके सहवाससे ऊषाका कुआँरपन नष्ट हो चुका था। उसके शरीरपर ऐसे चिह्न प्रकट हो गये, जो स्पष्ट इस बातकी सूचना दे रहे थे और जिन्हें किसी प्रकार छिपाया नहीं जा सकता था। ऊषा बहुत प्रसन्न भी रहने लगी। पहरेदारोंने समझ लिया कि इसका किसी-न-किसी पुरुषसे सम्बन्ध अवश्य हो गया है। उन्होंने जाकर बाणासुरसे निवेदन किया—‘राजन्! हमलोग आपकी अविवाहिता राजकुमारीका जैसा रंग-ढंग देख रहे हैं, वह आपके कुलपर बट्टा लगानेवाला है॥ २७-२८॥