श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

अनिरुद्धं विलिखितं वीक्ष्योषावाङ्मुखी ह्रिया।

सोऽसावसाविति प्राह स्मयमाना महीपते॥ २१

aniruddhaṃ vilikhitaṃ vīkṣyoṣāvāṅmukhī hriyā|

so'sāvasāviti prāha smayamānā mahīpate|| 21

अर्थ

परीक्षित्! जब उसने अनिरुद्धका चित्र देखा, तब तो लज्जाके मारे उसका सिर नीचा हो गया। फिर मन्द-मन्द मुसकराते हुए उसने कहा—‘मेरा वह प्राणवल्लभ यही है, यही है’॥ २१॥

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