॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.62.21
अनिरुद्धं विलिखितं वीक्ष्योषावाङ्मुखी ह्रिया।
सोऽसावसाविति प्राह स्मयमाना महीपते॥ २१
aniruddhaṃ vilikhitaṃ vīkṣyoṣāvāṅmukhī hriyā|
so'sāvasāviti prāha smayamānā mahīpate|| 21
अर्थ
परीक्षित्! जब उसने अनिरुद्धका चित्र देखा, तब तो लज्जाके मारे उसका सिर नीचा हो गया। फिर मन्द-मन्द मुसकराते हुए उसने कहा—‘मेरा वह प्राणवल्लभ यही है, यही है’॥ २१॥