श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

तमहं मृगये कान्तं पाययित्वाधरं मधु।

क्वापि यातः स्पृहयतीं क्षिप्त्वा मां वृजिनार्णवे॥ १७

tamahaṃ mṛgaye kāntaṃ pāyayitvādharaṃ madhu|

kvāpi yātaḥ spṛhayatīṃ kṣiptvā māṃ vṛjinārṇave|| 17

अर्थ

उसने पहले तो अपने अधरोंका मधुर मधु मुझे पिलाया, परन्तु मैं उसे अघाकर पी ही न पायी थी कि वह मुझे दुःखके सागरमें डालकर न जाने कहाँ चला गया। मैं तरसती ही रह गयी। सखी! मैं अपने उसी प्राणवल्लभको ढूँढ़ रही हूँ॥ १७॥

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