॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.61.4
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-
भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः ।
पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनंगबाणै-
र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न शेकुः॥ ४
smāyāvalokalavadarśitabhāvahāri-
bhrūmaṇḍalaprahitasauratamantraśauṇḍaiḥ |
patnyastu ṣoḍaśasahasramanaṃgabāṇai-
ryasyendriyaṃ vimathituṃ karaṇairna śekuḥ|| 4
अर्थ
वे सोलह हजारसे अधिक थीं। अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे युक्त मनोहर भौंहोंके इशारेसे ऐसे प्रेमके बाण चलाती थीं, जो काम-कलाके भावोंसे परिपूर्ण होते थे, परन्तु किसी भी प्रकारसे, किन्हीं साधनोंके द्वारा वे भगवान्के मन एवं इन्द्रियोंमें चंचलता नहीं उत्पन्न कर सकीं॥ ४॥