इसके बाद रुक्मीने एक लाख मुहरोंका दाँव लगाया। उसे बलरामजीने जीत लिया। परन्तु रुक्मी धूर्ततासे यह कहने लगा कि ‘मैंने जीता है’॥ ३०॥
ततो लक्षं रुक्म्यगृह्णाद् ग्लहं तत्राजयद् बलः।
जितवानहमित्याह रुक्मी कैतवमाश्रितः॥ ३०
इसके बाद रुक्मीने एक लाख मुहरोंका दाँव लगाया। उसे बलरामजीने जीत लिया। परन्तु रुक्मी धूर्ततासे यह कहने लगा कि ‘मैंने जीता है’॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.61.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 523) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/61/30/