श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

अनक्षज्ञो ह्ययं राजन्‍नपि तद‍्व्यसनं महत्।

इत्युक्तो बलमाहूय तेनाक्षै रुक्म्यदीव्यत॥ २८

anakṣajño hyayaṃ rājannapi tadvyasanaṃ mahat|

ityukto balamāhūya tenākṣai rukmyadīvyata|| 28

अर्थ

राजन्! बलरामजीको पासे डालने तो आते नहीं, परन्तु उन्हें खेलनेका बहुत बड़ा व्यसन है।’ उन लोगोंके बहकानेसे रुक्मीने बलरामजीको बुलवाया और वह उनके साथ चौसर खेलने लगा॥ २८॥

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