श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

नैवालीकमहं मन्ये वचस्ते मधुसूदन।

अम्बाया इव हि प्रायः कन्यायाः स्याद् रतिः क्‍वचित्॥ ४७

naivālīkamahaṃ manye vacaste madhusūdana|

ambāyā iva hi prāyaḥ kanyāyāḥ syād ratiḥ kvacit|| 47

अर्थ

मधुसूदन! आपने कहा कि किसी अनुरूप वरको वरण कर लो। मैं आपकी इस बातको भी झूठ नहीं मानती। क्योंकि कभी-कभी एक पुरुषके द्वारा जीती जानेपर भी काशी-नरेशकी कन्या अम्बाके समान किसी-किसीकी दूसरे पुरुषमें भी प्रीति रहती है॥ ४७॥

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