श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त-

र्मांसास्थिरक्तकृमिविट्कफपित्तवातम्।

जीवच्छवं भजति कान्तमतिर्विमूढा

या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री॥ ४५

tvakśmaśruromanakhakeśapinaddhamanta-

rmāṃsāsthiraktakṛmiviṭkaphapittavātam|

jīvacchavaṃ bhajati kāntamatirvimūḍhā

yā te padābjamakarandamajighratī strī|| 45

अर्थ

यह मनुष्यका शरीर जीवित होनेपर भी मुर्दा ही है। ऊपरसे चमड़ी, दाढ़ी-मूँछ, रोएँ, नख और केशोंसे ढका हुआ है; परन्तु इसके भीतर मांस, हड्डी, खून, कीड़े, मल-मूत्र, कफ, पित्त और वायु भरे पड़े हैं। इसे वही मूढ़ स्त्री अपना प्रियतम पति समझकर सेवन करती है, जिसे कभी आपके चरणारविन्दके मकरन्दकी सुगन्ध सूँघनेको नहीं मिली है॥ ४५॥

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