श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

तं त्वानुरूपमभजं जगतामधीश-

मात्मानमत्र च परत्र च कामपूरम्।

स्यान्मे तवाङ्‌घ्रिररणं सृतिभिर्भ्रमन्त्या

यो वै भजन्तमुपयात्यनृतापवर्गः॥ ४३

taṃ tvānurūpamabhajaṃ jagatāmadhīśa-

mātmānamatra ca paratra ca kāmapūram|

syānme tavāṅghriraraṇaṃ sṛtibhirbhramantyā

yo vai bhajantamupayātyanṛtāpavargaḥ|| 43

अर्थ

प्रभो! आप सारे जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। आप ही इस लोक और परलोकमें समस्त आशाओंको पूर्ण करनेवाले एवं आत्मा हैं। मैंने आपको अपने अनुरूप समझकर ही वरण किया है। मुझे अपने कर्मोंके अनुसार विभिन्‍न योनियोंमें भटकना पड़े, इसकी मुझको परवा नहीं है। मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि मैं सदा अपना भजन करनेवालोंका मिथ्या संसारभ्रम निवृत्त करनेवाले तथा उन्हें अपना स्वरूपतक दे डालनेवाले आप परमेश्‍वरके चरणोंकी शरणमें रहूँ॥ ४३॥

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