श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा

यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम्।

तेषां विभो समुचितो भवतः समाजः

पुंसः स्त्रियाश्‍च रतयोः सुखदुःखिनोर्न॥ ३८

tvaṃ vai samastapuruṣārthamayaḥ phalātmā

yadvāñchayā sumatayo visṛjanti kṛtsnam|

teṣāṃ vibho samucito bhavataḥ samājaḥ

puṃsaḥ striyāśca ratayoḥ sukhaduḥkhinorna|| 38

अर्थ

जगत‍्में जीवके लिये जितने भी वाञ्छनीय पदार्थ हैं—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—उन सबके रूपमें आप ही प्रकट हैं। आप समस्त वृत्तियों—प्रवृत्तियों, साधनों, सिद्धियों और साध्योंके फलस्वरूप हैं। विचारशील पुरुष आपको प्राप्त करनेके लिये सब कुछ छोड़ देते हैं। भगवन्! उन्हीं विवेकी पुरुषोंका आपके साथ सम्बन्ध होना चाहिये। जो लोग स्त्री-पुरुषके सहवाससे प्राप्त होनेवाले सुख या दुःखके वशीभूत हैं, वे कदापि आपका सम्बन्ध प्राप्त करनेके योग्य नहीं हैं॥ ३८॥

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