yacchan priyatamaṃ kiṃ nu raktāstanmātaro yathā|| 36
अर्थ
ऐसी स्थितिमें जो परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको श्रद्धा और भक्तिसे माताके समान अनुरागपूर्वक अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु और उनको प्रिय लगनेवाली वस्तु समर्पित करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ ३६॥✎ 2060
किं पुनः श्रद्धया भक्त्या कृष्णाय परमात्मने।
यच्छन् प्रियतमं किं नु रक्तास्तन्मातरो यथा॥ ३६
ऐसी स्थितिमें जो परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको श्रद्धा और भक्तिसे माताके समान अनुरागपूर्वक अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु और उनको प्रिय लगनेवाली वस्तु समर्पित करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 160) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/6/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)